एक भटकती प्रेतात्मा की खौफ़नाक कहानी
नमस्कार दोस्तो,मेरा नाम है संजीत राय बहुत दिनों से मैं भी एक ऐसी भुतही घटना का वर्णन करना चाहता हूं जिसे मैंने अपने घर के बड़े-बुजुर्गो से अक्सर इस भुतही घटना के बारे में सुनते आया हूं । हालांकि मैं भूत-प्रेत,चुड़ैल और ऐसी कोई भी अंधविस्वास फैलाने वाली बातों पर विस्वास नही करता हूं, लेकिन कभी-कभी हमारे या आप के जीवन मे ऐसी कई घटनाएं हो जाती है जिस से हमे ऐसा एहसास होने लगता है कि वास्तव में संसार मे भूत-प्रेत भी होते है। दोस्तो कभी-कभी हमारे आस-पास या हमारे घर मे कुछ ऐसी घटनाएं होने लगती है जिसका कि आज भी विज्ञान में इसका कोई जवाब नही है। दोस्तो हम इस बात पे बहस करें इसमे कोई फायदा नही है,तो मुद्दे पर आते हुए मैं आज आप लोगो को अपनी पहली और एकदम रोमांचक भुतही कहानी सुनाता हूँ जिसे मैंने बड़े-बुजुर्गों से अक्सर सुनी है । बात आज से लगभग 30 या 40 साल पुरानी है तब आस-पास के गांव जवार में आवागमन के उतने साधन नही होते थे,गांव में कुछ बड़े बबूवान साहब और रहिस लोग के पास ही इक्का-दुक्का स्कूटर या साइकल होती थी,लोग उस समय पैदल ही सफर करते थे ,गांव में यदि किसी की शादी पड़ जाए तो उस समय की बाराती लोग पैदल ही 20-25 कोस बारात करने जाते थे दुलहा को डोली में बैठाकर या फिर नाव से बारात ले जाते थे और रास्ते के लिए सतुआ और लड्डू -टिकरी भी साथ मे रखे रहते थे जहां बारात रुकती थी तो सब एक साथ आराम करते हुए जलपान करते थे,मनोरंजन के साधन भी गांव में न के बराबर थे । उस जमाने मे लइका लोग चिक्का-कबड्डी और ओल्हापति,फुटबाल और कुस्ती में दाव-पेच आज़माते थे। गांव के बुजुर्ग लोग ठंडी में रात को पूवरा (धान का सूखा तना) को जला के अलाव के आस-पास घेरा बना के रेडियो सुनते और गांव-जवार की चर्चा करते थे ।गांव में उस जमाने मे बिजली भी बहुत कम या इक्का दुक्का गांव में ही रहती थी। इसलिए गांव के सभी बुजुर्ग- बच्चे शाम होते ही गांव में हमारे प्रधान जी के दरवाजे पर इकट्ठा होती थी वही अलाव जलता और गांव जवार की चर्चा शुरू हो जाती थी ।एक बार कड़कड़ाती ठंडी के मौसम में हम सब लोग अलाव के पास बैठे अपने अपने ठेकुआ मार गए हाथ-पैर को सेक रहे थे और घर के बड़े -बुजुर्ग भूतो-और प्रेतों की चर्चा छेड़े बैठे थे की कैसे हमारे गांव के वीर बलवान अमर चाचा ने एक भूत से सामना होने पर भी डर नही लगा था । चुकि कहानी कुछ इस प्रकार है कि हमारे घर के अमर चाचा जो हमसे उम्र में कम से 30 साल बड़े है उस समय हाई स्कूल में पढ़ते थे । गांव में सबसे बड़े शरीर और कद-काठी के अमर चाचा बहुत ही निडर और बलशाली थे कुश्ती और कबड्डी में तो गांव के क्या कहने आस-पास के कई गांव के लड़कों को ऐसे उठा-उठा के पटकते थे कि लोग उनको प्यार से पहलवान साहब कह के बुलाते थे,अमर चाचा को कुश्ती और कबड्डी के अलावा फुटबाल का खेल भी बहुत अच्छे से खेल लेते थे,अपने स्कूल की तरफ से वे कई बार फुटबाल खेलने के लिए जिले से बाहर भी जाते थे । भादो का महीना था और हमारे अमर चाचा अपने स्कूल की तरफ से फुटबाल खेलने के लिए गांव से करीब 10 कोस दूर ब्लॉक स्तरीय प्रतियोगिता में खेलने के लिए गए थे,चूंकि प्रतियोगिता का समय शाम 4 बजे से था तो प्रतियोगिता के खत्म होते शाम के 6 बज गए थे,इसके बाद वही पर रात को खान-पान की व्यवस्था भी थी अमर चाचा को वापसी के समय रात 8 बज चुके थे,स्कूल के सारे बच्चे अपने अपने गांव को रात में ही रवाना हुए,चूंकि हमारा गांव ब्लॉक से सीधा रास्ता से दूरी 10 कोस थी और एक और रास्ता भी था जिस से दूरी 6 कोस के आस-पास थी और उसी रास्ते मे हम लोगो का एक डेरा(जहां ट्यूबवेल और खेत मे एक छोटी झोपड़ी लगा रहता है) भी था इसलिए अमर चाचा ने सोचा कि रात में घर पर ना जाकर आज रात अपने डेरे पर ही सो लिया जाए,क्योंकि घर जाने पर पिता जी की डांट भी पड़ती इतनी रात में बाहर से आने पर लेकिन ये रास्ता बहुत ही खराब और झाड़-झंखाड़ वाला रास्ता है जिस से लोग आवागमन बहुत कम करते थे,और जब रास्ता हमारे गांव के पास पहुँचता था तो गांव से 3कोस दूर ही एक बहुत ही विशाल आम का बगीचा पड़ता था जो कई कोस में फैला हुआ था ,बगीचा इतना घना था कि दिन में भी कभी-कभी बगीचे में रात जैसा एहसास होता था,उस बगीचा के बारे में इतनी हौलनाक और भयानक कहानियां थी जीस से दिन में भी गांव के बहुत कम लोग उस बगीचा में जाते या उस रास्ते का उपयोग बहुत कम करते थे,गांव के बड़े बुजुर्गों का कहना था कि रात के समय उस आम के बगीचे में भूत-प्रेत का आतंक इतना ज्यादा हो जाता है कि आस-पास के गांव वाले उसे भूतहिया बारी कहा करते थे,और कभी कभी तो रात के समय उस बारी से लूकार (आग का गोला) उठते हुए भी आसानी से दिख जाता था,बुजुर्गो का कहना था कि ये लूकार भूतो द्वारा निकाले जाते है। तो दोस्तो आइये अब फिर से कहानी पर,चूंकि रात हो गई थी और ब्लॉक से गांव की दूरी भी बहुत थी तो अमर चाचा पैदल ही उसी कम दूरी वाले रास्ते से अपने डेराआने लगे ।डेरा भूतहिया बारी के पास ही थी ।करीब 1:30 बजे के समय था और हल्की बारिश हो रही थी अमर चाचा रात में अकेले ही एक बैटरी वाले टार्च लिए गांव के करीब भूतहिया बारी के पास थे,रात ऐसी भयानक की झींगुर और बरसाती मेढकों से पूरा सिवान और भूतहिया बारी गुंजायमान हो रही थी,अब तो अमर चाचा को थोड़ा-थोड़ा डर भी लगने लगा था लेकिन अमर चाचा हिम्मती और नौजवान थे तो उन्होंने अपने डर को बाहर निकाला और भूतहिया बारी से होते हुए डेरे की तरफ बढ़ने लगे,अभी बारी में आगे बढ़ते कुछ ही समय हुआ था कि जैसे उन्हें भान हुआ कि कोई बहुत ही विशाल सांड उनसे कुछ ही दूरी पर होंकार रहा है,अमर चाचा ने अपनी टॉर्च की रोशनी जैसे ही आवाज़ की तरफ की तो आवाज़ बन्द हो गयी और बारी में फिर से मेंढक और झींगुरों की आवाज़ गूंजने लगी,अमर चाचा को लगा कि शायद उनको वहम हुआ है जैसे ही चलने को हुए फिर से साढ़ के हुकारने की आवाज आने लगी और ऐसा लगा कि आवाज़ बहुत पास से आ रही है,अमर चाचा ने फिर से टॉर्च की रोशनी को आवाज़ की तरफ किये तो आवाज़ फिर से बंद हो गयी,अब तो आवाज़ बदल -बदल के आने लगी कभी साढ़ तो कभी सियार के रूप में आवाज़ आने लगी और बारी में तेज हवा का झोंका भी शुरू हो गया, अमर चाचा अब थोड़ा डरे और हनुमान चालीसा का जप करते हुए बारी को पार कर गए पर आवाज़ उनका पीछा करती रही लेकिन अमर चाचा बिना डरे ही अपने डेरा पहुच गए,डेरे पर उनका एक बनिहार सोता था जिसका नाम पहलवान था और वो उनका खेती -किसानी के साथ डेरा पर ही रात को सोता था,अमर चाचा ने पहलवान को जगाया और डेरे में दाखिल हो गए,अमर चाचा ने सारी बात पहलवान को बताई तो पहलवान ने कहा कि मैंने भी उस आवाज़ को यही से सुना है,फिर दोनों सोने की कोशिश करने लगे अभी कुछ ही समय हुआ था कि डेरे के कुंवे के पास किसी बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई देने लगी ,अमर चाचा ने पहलवान से कहा कि इतनी रात में बच्चा कैसे कुंवे के पास पहुच गया फिर दोनों ने टॉर्च हाथ मे पकड़ा और कुंआ के पास पहुँचे, तभी एक ऐसी घटना घटी की दोनों के होश उड़ गए ।कुंवे के मुंडेर के पास एक 2 या 3 साल का बच्चा था जो वही बैठ कर रो रहा था फिर जैसे ही उसने इन दोनों को देखा तो वह धीरे धीरे हाथ के बल चलते हुए कुंवे में गिर गया,दोनो ने पास जाकर कुंवा में झांक कर देखा तो कुंवा एकदम शांत लग रहा था जैसे कि कुंवा में कुछ गिरा ही नही हो ।दोनो अभी कुंवा में देख ही रहे थे कि ऐसा लगा जैसे इनके पीछे कोई खड़ा है पलट कर देखा तो एक भयानक से भूत बड़ी और लाल लाल आंखों से इनको ही घूर रहा था,अब तो अमर चाचा और पहलवान की हिम्मत जवाब देने लगी लेकिन फिर सोचा कि इस समय अगर डर गए तो ये भूत आज हम लोग की बलि ले लेगा फिर क्या था अमर चाचा और पहलवान भीड़ गए भूत से कभी भूत इन दोनों को उठा के पटकता तो कभी ये दोनों उठा के भूत को पटक देते ।इस प्रकार लड़ते लड़ते अमर चाचा को और पहलवान को सुबह 4 बज गए ।4 बजते ही ब्रह्म मुहूर्त शुरू हो गया और फिर अचानक से भूत गायब हो गया ।अमर चाचा और पहलवान दोनो अब लड़ते लड़ते इतने थक गए थे लेकिन फिर भी अब आराम करना छोड़ गांव की तरफ रवाना हो गए ।घर पहुच कर सारी बात को पिता जी से बताये तो पिता जी ने बताया कि बहुत साल पहले नन्हकू कोहार का लड़का जो 15 साल का था होली में होलिका दहन के समय होलिका से मशाल ले के भागने की परंपरा में रात को भागते समय उसी कुंवा में गिर कर और डूब जाने से उसकी मृत्यु हो गयी थी।जो आज भी मरने के बाद भी भूत बनकर भूतहिया बारी से आने -जाने वालों को परेशान करता है ।तो आखिर कौन था नन्हकू कोहार और कैसे गिरा उसका लड़का उस कुंवा में और भूत कैसे बन गया इस बारे में जल्द ही एक नई कहानी के साथ आपके सामने प्रस्तुत करूँगा । तो कैसी लगी मेरी ये पहली डरावनी कहानी दोस्तो अपने विचार जरूर बताइयेगा । धन्यवाद ।।
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